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Tuesday, April 8, 2008

कुपोषण से तंग बिरनीपाली की दलित महिलाएं


विनोद डोंगरे

गरीबी व अशिक्षा को दूर करने तमाम सरकारी योजनाएं भले चल रही हों, पर योजनाओं का लाभ जरूरतमंदों तक कब पहुंचेगा,कहना मुश्किल है। रायगढ़ के बरमकेला इलाके के दलित महिलाओं की कुपोषणग्रसित दशा तो यही बताती है कि गरीब अभी भी भर पेट भोजन के मोहताज हैं।अनेक बीमारियों से तंग ज्यादातर ये महिलाएं मजदूर परिवार की हैं, जिनकी दिनचर्या हाड़तोड़ मेहनत से शुरू होती है और थकान भरी सांझ में खत्म हो जाती है। उनमें अशिक्षा और गरीबी है।विकासखंड बरमकेला जिला मुख्यालय रायगढ़ से 65 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। बरमकेला से तकरीबन 27 किलामीटर की दूरी पर है ग्राम-बिरनीपाली। दलित बाहुल्य यह गांव छत्तीसगढ़ का आखिरी गांव है। इसके बाद राष्ट्रीय राजमार्ग पर पड़ने वाला अगला ग्राम ग्रिंजल से उड़ीसा प्रदेश की शुरूआत हो जाती है। बिरनीपाली की कुल आबादी साढ़े तीन हजार के आसपास है। ठाकुर, ब्राम्हण तथा कुछ पटेल को छोड़ दें तो दलित समुदाय ही यहां का बाशिंदा है। यूं तो पूरे बरमकेला विकासखंड में गांड़ा, घसिया व सतनामी जाति की अधिकता है, पर इस गांव में ज्यादा संख्या गांडा जाति की है। रोहनमती चौहान (35 वर्ष) इसी गांव में रहती है। पिछले लंबे समय से एनीमिया व सीने के दर्द से हलाकान रोहनमती खेतों में मजदूरी करके अपने 3 छोटे बच्चों वाले परिवार का पेट पालती है। पति शंभू चौहान भी मजदूरी करता है, पर पति-पत्नी दोनों की कमाई से बमुश्किल घर का खर्च चलता है। वे राशन व जरूरत के कपड़े आदि ही खरीद पाते हैं, बीमारी के इलाज व बच्चों की पढ़ाई जैसे खर्च के लिए उनके पास कोई साधन नहीं है। रोहनमती कहती है कि 'कभी कभार गांव पहुंचने वाले सरकारी डाक्टर और नर्सों की दी दवाईयां खा-खाकर तो थक गई, अब कोई इलाज नहीं चल रहा है। ठीक होना होगा तो हो जाएगा, नहीं तो क्या कर सकती हूं। पास में इतने रूपए हैं नहीं कि बड़े अस्पतालों में इलाज करा लें, अब तो किस्मत का ही सहारा है।बिरनीपाली में ही रहने वाली बिरसमतिया सोनवानी (40 वर्ष) की हालत भी काफी दयनीय है। सुअर पालन करने वाले परिवार से जुड़ी यह महिला शारीरिक रूप से बहुत कमजोर हैं। डाक्टरों ने उसे आस्टियोपोरोसिस बीमारी होने की बात बताई है। बिरसमतिया का कहना है कि फ्री में इलाज की उम्मीद में जिला अस्पताल रायगढ़ तक चली गई, पर लाभ कुछ नहीं मिला। दसियों साल पुरानी यह बीमारी अब भी जस की तस है।बीमारियों से दो चार हो रही महिलाओं में केवल रोहनमती व बिरसमतिया ही नहीं हैं, बल्कि इसी गांव की सूरजबाई, कांदलबाई, रूपमती गनेशिया व सुभद्रा गंधर्व समेत दर्जनों ऐसी महिलाएं हैं, जो पेट, सीने, फेफड़े व दूसरी बीमारियों से त्रस्त हैं। इनमें से गनेशिया की हालत तो और भी दयनीय है, जिसका एक डेढ़ साल का बच्चा है और वह स्तन कैंसर से पीड़ित है। ईंट, पत्थर का काम करके परिवार का गुजारा करने वाले इसके पति रोहित सोनवानी का कहना है कि गनेशिया का उपचार कराने उसे बरमकेला के एक निजी नर्सिंग होम ले गया था। डाक्टर ने जांच-पड़ताल के बाद आपरेशन की सलाह दे दी है, पर उनके पास आपरेशन के लिए पैसे नही हैं। सरकारी अस्पताल से फ्री में इलाज क्यों नहीं कराते ? पूछने पर रोहित कहता है कि इसके लिए राशन कार्ड की जरूरत बताई गई और उन्हें राशन कार्ड मिला ही नहीं है। इसलिए सरकारी अस्पताल भी नहीं गया। साधारण बीमारी तक के उपचार से महिलाओं का वंचित होने से वहां पर स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव तो साफ दिखता ही है, पर कुपोषण इस इलाके की प्रमुख समस्या है। केवल बिरनीपाली ही नहीं बल्कि डोंगरीपाली, झिकीपाली, आमापाली, पतरापाली, झाल, परसकोल,माछीमुड़ा व जामदलखा जैसे अनेकों गांवों में रहने वाली महिलाओं की हालत लगभग यही है। मिट्टी की दीवारों व छप्पर वाले जीर्ण शीर्ण मकानों में रहने वाले इन गरीब परिवारों के आहार में चावल, रोटी व तरह-तरह के पकवान नहीं बल्कि चावल का पेज-पसिया व आलू आदि की सस्ती सब्जियां ही शामिल हैं। ज्यादातर अशिक्षित इन परिवारों का भोजन सेहत नहीं बल्कि किसी तरह भूख मिटाने के लिए होता है। दिनभर वे हाड़तोड़ मेहनत करते हैं व शाम को रूखा सूखा भोजन खाकर सो जाते हैं। रायगढ़ जिले के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डा.जी के सक्सेना का कहना है कि स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी ही इनके कुपोषण का कारण नहीं बल्कि उनकी जीवनशैली भी इसका एक प्रमुख कारण है। मजदूर महिलाएं व पुरूष चावल रोटी नहीं खाते बल्कि पसिया पीना पसंद करे हैं। इसके अलावा दिन भर की थकान दूर करने के लिए वे शराब पीते हैं, जो कि उनके स्वास्थ्य के लिए बेहद नुकसानदायक है। ऐसे में उनकी सेहत अच्छी कैसे रह सकती है.? महिला एवं बाल विकास विभाग की जिला कार्यक्रम अधिकारी श्रीमती खलखो कहती हैं कि इन इलाकों में आंगनबाड़ी केन्द्रों के माध्यम से महिलाओं को पोषणाहार देने की व्यवस्था है, पर ज्यादातर महिलाएं केन्द्र पहुंचती हीं नहीं हैं, न ही वे आंगनबाड़ी से मिलने वाले सुविधाओं पर रूचि लेती हैं। (पैनोस साउथ एशिया के फेलोशिप हेतु किए गए अध्ययन का अंश)